Friday, 9 July 2010

बुढ़ापे में मां-बाबूजी














जैसे कि एक की सांस का होना
दूसरे के लिए बेहद ज़रूरी है

एक जो पहले सोता है
लेता है घर्राटे ज़ोर-ज़ोर से

और दूसरे जागता रहता है
उसके सहारे,
उसकी डोर थामे

उसके लिए
यह सांसों की आवाज़ एक आश्वासन है

जीने की लय

जीने का जरिया और मतलब

जीने की वज़ह

एक का खर्राटा बचाता है दूसरे को अकेला होने से

कभी-कभी लगता है खर्राटे लेने वाला करता रहता है
दूसरे की सांस की रखवाली।

3 comments:

  1. शानदार पोस्ट

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  2. एक का खर्राटा बचाता है दूसरे को अकेला होने से
    कभी-कभी लगता है खर्राटे लेने वाला करता रहता है दूसरे की सांस की रखवाली।

    ज़िन्दगी के इस आखिरी पड़ाव में शायद ये खर्राटे ही साथ रह जाते हैं ......
    इन खर्राटों के पीछे छिपा है अकेलेपन का दर्द........!!

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  3. "उसके लिए यह सांसों की आवाज़ एक आश्वासन है"
    मौलिक, नितान्त यथार्थ और सशक्त!
    बहुत ख़ूब।

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