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Friday, 25 May 2012

साइकिल को बैलगाड़ी की तरह हांकती लड़की


















  • अभिज्ञात
वह एक लेडीज़ साइकिल थी
जिसे चलाता हूं मैं
मगर उस पूरी तरह से नियंत्रण है मेरी बेटी का
जो बैठी होती है मेरे पीछे कैरियर पर
लेकिन वह साइकिल को इस तरह हांकती है
जैसे वह साइकिल नहीं
कोई बैलगाड़ी हो
और मैं बैल

पापा थोड़ा दाएं
अरे इतना नहीं
नाली में घुसा देंगे क्या
ज़रा धीरे
क्या आगे वाले को टक्कर मारे देंगे
उफ इतना भी धीरे नहीं
क्या साइकिल चलाते-चलाते सोने लगे
हवा कम है लगता है पिछले टायर में
चेक क्यों नहीं कर लेते
घर से निकलने से पहले
ब्रेंक तो कभी ठीक रहता नहीं
यहां रोकने के बदले वहां रोकते हैं

आपसे तो कुछ भी नहीं होता पाप
क्या हो गये एकदम बूढ़े
आफिस देर से पहुंचूंगी
कैसा लगेगा
यदि को टोक दे तो
अपनी वज़ह से मुझे कभी नहीं हुई देर
इत्ते लम्बे-लम्बे बाल मैंने कितनी जल्दी संवारे
मां के घर नहीं रहने पर
मैंने कितनी जल्दी किया नाश्ता
कोई ना-नुकुर नहीं की बाई के हाथ की बनी सब्जी खाने में
टिफिन बाक्स भी आपने नहीं
बाई ने तैयार किया था
आप करते ही क्या है मेरे लिए
और मैं तो कहती हूं
पूरी ज़िन्दगी आपने कुछ नहीं किया मेरे लिए
बस नर्सरी में गये होंगे एडमिशन कराने
सभी बच्चों के मां-बाप
आते हैं स्कूल छोड़ने
ज्यादातर बच्चों की मां तो दोपहर में भी
रहती है स्कूल के आस-पास किसी पार्क में
ताकि खाना खिला सकें
स्कूल में लंच के वक़्त
और जाते समय उन्हें लेते जायें
स्कूल छूटने पर अपने साथ
कई गार्जियन तो घर में टीवी तक नहीं देखते कि कहीं बच्चा भी न देखने लगे
और हो जाये उसकी पढ़ाई का नुकसान
ज़्यादातर गार्जियंस को तो याद रहता है अपने बच्चों का पाठ्यक्रम
क्योंकि वे ख़ुद पढ़कर उन्हें पढ़ाते हैं
वे बच्चों के टाइम टेबुल के हिसाब से
फिक्स कर लेते हैं अपनी दिनचर्चा
और एक आप हैं
आप देखने नहीं देते मेरी पसंद का सीरियल और अपनी पसंद का मुशायरा देखते रहते हैं ईटीवी पर
या फिर बूढ़ों के इश्क के सीरियल

आपने स्कूल व कॉलेज की फीस
देने के अलावा किया ही क्या है मेरे लिए

जल्दी ही शादी कर चली जाऊंगी अपनी ससुराल
और आपको कभी याद नहीं करूंगी
आपने याद रखने लायक
किया ही क्या है
और वह तो रिक्शेवालों के कपड़े और देह मारती रहती है बदबू
वरना मैं कभी नहीं आती आपके साथ साइकिल से ट्रेन पकड़ने
मेरे आफिस के लोग सुनेंगे तो हंसेंगे
एक आफिसर स्टेशन आती है बाप के साथ साइकिल पर

और हां, इस साइकिल पर मत इतराइये
इसे मुझे दिया था मेरी दादी ने
मेरे 12 वें जन्म दिन पर
वह तो मैंने नहीं चलाया
तो आपको मिल गयी
आपसे इतना तो हुआ नहीं कि
दूसरी ले लें
10-12 से खींच रहे हैं इसी को

रोज कोई न कोई पुर्जा दे जाता है
जवाब
जितना रिपेयरिंग में खर्च करते हैं
उतने में आ जायेगी नयी
कई बार कहा है स्कूटर ले लो
पर एक्सीडेंट से कितना डरते हैं आप
मां ठीक कहती है
आप हैं एकदम घोंचू

देखिये गिराइये मत
आपका कोई ठिकाना नहीं
पता नहीं क्या सोचते हुए साइकिल चलाते हैं
अनिल अम्बानी को देखिये क्या हैं उसके बेटे के ठाट
विजय माल्या ने तो अपन बेटे सिद्धार्थ को
बर्थडे गिफ्ट दिया था प्लेन
काश मैं भी किसी मालदार की बेटी होती
तो न साइकिल पर जाना पड़ता
ट्रेन में खाने पड़ते धक्के


मैं तो अपने बच्चों को
वह कष्ट नहीं दूंगी
जो दिये हैं आपने मुझे
एक-एक चीज़ के लिए तरसा दिया
कई बार तो तोड़ कर ले लिया
गुल्लख तोड़ कर मेरे पैसे
छीः पापा छीः
आप पर मुझे आती है शर्म
आपकी सैलरी है मेरी पहली सैलरी से भी कम
पढ़कर क्या किया पापा आपने
शेम आन यू
वो तो मैं पढ़ गयी अपने बलबूते
वरना आपने कब पढ़ाया ट्यूशन
फिर भी इतराते हैं इतनी ऊंची पढ़ाई
कराई
मैं भी यदि अन्य बच्चों की तरह पढ़ती कई-कई ट्यूशन
तब देखती क्या करते आप
आपको तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए
मैंने बचाये हैं आपके कितने ही रुपये
और प्लीज़ मेरी शादी की बात
मत करने लगियेगा सुबह-सुबह
मैं आपकी पसंद के
लड़के से नहीं करूंगी शादी
मैं आपकी पसंद जानती हूं
कैसा भी लड़का आपको पसंद आ जायेगा
और नहीं तो अपने जैसा कोई
बोर टाइप का लड़का खोज लेंगे
या फिर कोई फौजी
किसी बैंक आफिसर नहीं
मैं अपनी पसंद के लड़के से शादी करूंगी
जो दिखता हो रणबीर कपूर जैसा
आपको चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं
मैं खोज लूंगी

लो यह क्या, रास्ते भर आप बड़-बड़ करते रहे
और आज भी छुड़ा दी लेडीज़ स्पेशल
अब धक्के खाते हुए जाना पड़ेगा
दूसरी ट्रेन से
मम्मी से करूंगी आपकी शिकायत
कभी टाइम पर तैयार नहीं होते
रोज़ करा देते हैं देर।

Wednesday, 25 August 2010

राख की तरह

(भाऊ समर्थ की स्मृति में)
राख की तरह
अंतिम सिगरेट खलास करो
उन्होंने कहा
और वे खूब हंसे
एक निश्छल हंसी
जो दीवार में सेंध लगा सकती थी
उस दिन जबकि श्रद्धा पराते
पढ़ रही थीं उनके अतीत के मधु-क्षण
वह अन्तिम सिगरेट
मैंने जी
मेरे होंठ, मेरी उंगलियां, मेरे फेफड़े
भर गये एक साथ सिगरेट और
हंसी से।
उनके हाथ सहसा मेरे हाथ में थे
मिलना चाहते होंगे हाथ
उस सिगरेट से
जो उनके खलास होने के बाद
बची रहनी है कुछ दिन और
मैं उस खलास की हुई अंतिम सिगरेट के एवज में
कहीं भीतर सुलग रहा हूं
उनके अदृश्य हाथों में
दबा हुआ उनकी निश्छल हंसी वाले होठों से
धीरे-धीरे
मेरी आत्मा झड़ रही है
राख की तरह।
(रचना तिथि-14 अप्रैल 1991)
नोट-नागपुर में रहने वाले चित्रकार भाऊ समर्थ से कई बार मिलना हुआ था। मैं उन दिनों पेंटिंग करता था। उनकी अंतिम मुलाकात के बारे में उनकी मृत्यु के बाद लिखी गयी यह कविता मेरी एक डायरी में दबी एक पुर्जी में लिखी कहीं पड़ी रह गयी थी। आज मिली तो आपसे शेयर कर रहा हूं।

Sunday, 1 August 2010

तोड़ने की शक्ति

जाने क्यों अच्छी लगती हैं टूटने की आवाजें
जबकि बार-बार मुझे इंकार है ऐसी आवाजों को सुनने से

क्या हममें बसी है कोई पुरातन धुन
जिसकी लय देती है हमारी धमनियों को नई गति
और दिमाग को एक अजब सा सुकून

क्योंकि आखिरकार वही और वही है हमारी नियति

हालाांकि यह भी सच है कि हर समय हर घड़ी
नहीं होता शुभ किसी वस्तु का टूटने से रह जाना
यह टूटना ही वह सत्य है जिससे हमें होते जाना होता है
परिचित

न चाहते हुए भी
टूटने की क्रिया की स्वाभाविकता से हमें होना होता है बार-बार
दो चार
दरअसल हमें अपने अंदर टूटने की विवशता ही
हमें खुद करती है प्रेरित कुछ न कुछ तोड़ने को
यदि नहीं कर पाते हम
तो हो जाते हैं किसी टूटने की खुशी में शरीक

टूटते जाना एक उत्सव है
टूटना है एक संगीत
अर्थ का अंतिम बिन्दु
अनर्थ का चरम
दरअसल हमारा होना
टूटते जाने की एक क्रिया है

इस क्रिया में हमारा दिल बहलाव है कुछ न कुछ तोड़ते रहना
हम एक सच को खेल में तब्दील करते रहते हैं

जो अपने टूटने से जितना खाता है खौफ
तोड़ता है उतनी ही चीजें
वह उस बेचैनी को अभिव्यक्ति देता है जो है
उसके भीतर
हालांकि जब जब वह खुश होता है अपनी किसी सफलता पर
वह नापता है अपनी ऊंचाई
तोड़ने का शक्ति परीक्षण कर
वह इस बात को अनचाहे ही स्वीकार करता है
कि तोड़ने की शक्ति ही उसकी कुल उपलब्धि है

विस्तार है जो उसके भय का.

तैयारी

कपड़े तैयार थे
एकदम धुलधुलाकर
इस्त्री होकर
उनको देखो तो वे जैसे कह उठें
आओ चलें
और फिर सहसा जाना हुआ
मुझे
लगा सुन ली गई है कपडों की

उन्हीं के इशारे पर
हो रही है कूच

उन्हीं का किया धरा है सब कुछ
तबादला इस शहर से

उधर जहां कोई और है
अपरिचित शहर में मेरा इंतजार करता सा

फिर उसके बाद
नए शहर को
जब मैं कर चला पुराना
डरने लगा
कपडों की धज से

उनका साफ होना एक साथ
होना इस्त्री
रखा जना किसी आलमारी या सूटकेस में
डराने लगा
जैसे कि वे कर बैठेंगे कोई गाु मंत्रणा

उनका साथ होना
किसी खतरे के इशारे सा लगने लगा

मैं डरता हूं
कपडों के किसी विशेष इशारे की झंडी होने से

दरअसल मैं
हर चीज़ के झंडी होने के ख़िलाफ़ हूं

यह क्या कि कोई खो दे अपने होने को
और हो जाए कोई और संदेश
कोई इशारा
और उसका होना
बदल जाए न होने में

यह सब सोचते हुए
मैं बचना चाहता हूं
खुद अपने-आपको
कुछ और समझने से
समझने से ज्यादा
मानने से

मैं किसी और की रूह
और की देह
और की बात
होने से इनकार करता हूं
जो कि मैं
अंतत: हूं शायद

और इसी इनकार और स्वीकार के बीच
कहीं किसी बिन्दु पर
मेरा होना ही मेरा न होना और
न होना ही मेरा होना

आदमी कपडों की भाषा
शायद इसलिए समझता है
कि किसी किसी अर्थ में
मानवीय नियति के ही हिस्से हैं कपास
उसके बने सूत
या फिर वह कंबल
जिसकी बात कहते हैं कबीर

कपडे हमेशा
अपने होने व न होने के बीच
एक ऐसा फासला रखते हैं
जहां से हमें मिलती रहती है
किसी न किसी अनंत यात्रा की आहट।

वापसी

मैं अपने घर कब लौटूंगा!

जिसकी ख़ातिर मैं अपनों के अपनेपन से दूर रहा
जिसकी ख़ातिर मैं सपनों की हदबंदी को मज़बूर रहा
जिसको बनवाने की ख़ातिर रोज ही टूटा करता हूं
जिसको पाने की ख़ातिर मैं छूटा-छूटा करता हूं
जाने किस दीवाली में चौखट पर दीये बारूंगा
कब अपने ओसारे में मैं मुर्गी चूजे पालूंगा

मैं अपने घर अब लौटूंगा!

मैं जितना घर से दूर रहा बेगाना सा
हाल कोई जो पूछे लगता ताना सा
मैं सड़कें, गलियां, चेहरे ना पहचान सका
परदेश में खुद को आगंतुक भर मान सका
ख़त मिलते हैं पर बात वहीं रह जाती है
व्यथा नहीं बोली बतियाई जाती है

मैं अपने घर क्यों लौटूंगा?

टूटा मन, टूटी देह लिए तैयार हुआ
बरसों पहले का विद्रूप सा आकार हुआ
जाने संगी-साथी होंगे किस ओर-छोर
बस्ती गलियों का बदला होगा पोर-पोर
मैं जीते जी इतिहास सरीखा लगता हूं
मैं तो बस अब और किसी सा लगता हूं।

तुम्हारी दुनिया में मैं

अच्छा होता कि मेरी दुनिया होती निहायत ही मेरी
और तुम्हारी खलिस तुम्हारी
मेरी दुनिया में तुम होती मेरी तरह
और तुम्हारी दुनिया में मैं तुम्हारे मनमाफिक.

क्या है ऐसी कोई जुगत की दोनों की दुनिया रहे सलामत
एक दूसरे को बगैर पहुंचाए कोई ठेस.

होती
दोनों के बीच एक खिडक़ी
जिससे झांककर देखता मैं
कि रह रहा हूं मै कितने इतमीनान से
तुम्हारी दुनिया में.
तुम भी आती कभी पूछने हालचाल अपना.

क्या हमें नहीं चाहिए कोई और अपनी दुनिया में?

क्या हमें चाहिए आईनाघर?
जहां हम हों हमारी सूरत हो
हम हों और हो हमारी कल्पना
हम हों और हमारी पूरी होती अभिलाषाएं
हम हों और हमारे इशारों पर नाचती दुनिया
कितना अच्छा हो कि हम हों और हो दुनिया निहायत दूसरे की.

सपने

(देवदास के बहाने उसके रचनाकार शरदचन्द्र चट्टोपाध्याय को याद करते हुए)
मेरे पास कुछ नहीं था क्योंकि मेरे पास
केवल सपने थे
उनके पास कुछ नहीं था
क्योंकि उनके पास सब कुछ था
बस सपने नहीं थे
वे मेरे सपने खरीदना चाहते थे
मैं उन्हें दे आया मुफ्त
जो मेरी कुल संपदा थी
अब उनकी बारी थी
उन्हें सब कुछ लुटाना पड़ सकता था मेरे सपनों पर
और इतना ही नहीं
होना पड़ सकता है उन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी कर्जदार
वे अगर सचमुच डूबना चाहते हैं मेरे सपनों की थाह लेने.

Friday, 30 July 2010

मेरे लिए कविताः वक्तव्य

॥ एक॥
मेरी किसी भी काव्यकृति में कविता पर मेरा वक्तव्य नहीं है। हालांकि इसके औचित्य के बारे में कभी गंभीरता से मैंने सोचा नहीं है। फिर भी मन है कि अपनी रचनाशीलता पर भी कुछ कहूं। क्या होती है कविता-यह मेरा अविष्कृत नहीं है, इसे परम्परा से ही प्राप्त किया है। अपनी किन्हीं शर्तों पर शायद अन्ततः नहीं बल्कि अपनी सीमाओं में। लिखना शुरू कर दिया था विधिवत बचपन में ही। जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ाता था मेरी पहली कविता छपी थी लेकिन भले बुरे की जो भी समझ विकसित हुई 1989 के बाद ही जब मैं कोलकाता आया और लगभग यहीं का होकर रह गया। इसके पहले का लेखन अभ्यास भर मान पाता हूं। पहली कविता लिखी थी प्रेम पत्र में। वह प्रेम पता नहीं कहां कब छूट गया, था भी या नहीं लेकिन कविता अब भी है आस-पास। नहीं भी हो तो भ्रम अवश्य है कि कविता से मेरा सरोकार है। कविता मैं क्यों लिखना चाहता हूं-बचना चाहते हुए भी?क्या पता। लिखने से बचना चाहता हूं-निछाह जीवन में उतरने के लिए, ताकि जी रहा होऊं तो कहीं भरपूर जीने से थोड़ा बचाकर उस जी रहे होने को स्मृति कोष में भरने की विवशता न रहे। सीधे निछक जीवन को पा लूं लेकिन नहीं। जहां जीने लायक कुछ नहीं लगता वहां एक आधार मिलता है कविता का कि इस स्थिति का रचनानुवाद उस अनुभव को लगभग प्रायोगिक या ऐच्छिक घटना क्रम में बदल देता है। और उन एकान्त क्षणों में जब मेरी विवशता मेरी रचनास्पद स्थितियों को समझने जानने वाला कोई नहीं होता-कविता को स्थानांतरित कर देता हूं।
कभी-कभी मुझे यह भी लगता है जैसे कविता कर्म मुझे अन्दर ही अन्दर संघर्षशील और यातनास्पद बनाने में जुटा हुआ है पता नहीं यह मेरे हित में किस प्रकार है। और जब भी अपने संघर्षों को लिपिबध्द करने बैठता हूं आत्मनिर्वासन पा जाता हूं। सार्वजनीन होने की कौन सी विवशता है? आत्मछल तो नहीं यह आत्मनिषेध। मैं चाहता हूं प्रत्येक कविता में भरसक मैं कहीं न कहीं होऊं। इस तरह की वह मेरी ही हो पाये। कविता मेरा मोनोग्राफ हो। अपने सामान्य अनुभवों के विशिष्ट आस्वादों पर लिखने की कोशिश मेरी रही है और मेरी संवदेनशीलता मुझे मेरे रचनाकर्म में बहुत काम आती है। ठीक वैसे ही जैसे मेरा क्रोध। विवेक सम्मत क्रोध की अभिव्यक्ति भले ही पिछड़े साहित्य की श्रेणी में आये मगर वह जितना, जहां भी आ पाया है वह मेरे लिए विशेष संतोष का है। और जहां क्रोध नहीं दीख पड़ेगा वहां क्रोध से अधिक कुछ है जो कातरता में बदल गया हो शायद। मुझे लगता है कि साहित्य में क्रोध का आशय बदलाव और विरोध का मुखर और तीव्रतम स्वर है। तिरस्कार और व्यंग्य भी मुझे कम महत्व के नहीं लगते। खास कर निहत्थे आदमी के पास अगर हो कविता तो। सन्त मुद्रा की कविता मेरे लिए कठिन है जहां आवेगों के लिए हिकारत हो। कविता के लिए विचार मुझे आवश्यक लगता है मगर खलिस विचार को कविता नहीं मान पाता। कविता में भावुकता दिखनी चाहिए और विचार केवल उसे संचालित, संयमित या दिशा-निर्देश देने वाला तत्व भर हो। कविता के लिए भावुकता को मैं विचार से कम मूल्यवान नहीं मान पाता हूं।
॥दो॥
-मैं इस सवाल को अपनी सुविधानुसार बदलना चांगा। मैं चाहता हूं कि यह टटोलने की कोशिश करूं कविता भी क्यों? जब अभिव्यक्ति के तमाम उपकरण मौजूद हों ऐसे में कविता की आवश्यकता आखिर क्योंकर है?क्या और आखिरकार कविता में क्या है ऐसा जो हो सकता है केवल कविता में?कोई नहीं ले सकता जगह इस विधा की। आखिर क्या होता है कविता में कि वह जीवन में आती है तो जीवन की चाल बदल जाती है। बदल जाते हैं जीवन के आशय। क्यों माना था धूमिल ने कविता आदमी के होने तमीज है। क्या कविता आदमी को अधिक आदमी बनाती है। क्या होता है कविता में वह जब टपकती है किसी की बातों से तो शब्द हमारी रूह को भी छूने लगते हैं। क्या है कविता में कि वह शब्दों से ले जाती है हमें परे। वह क्या है जो विचारों को कई बार कर देती है बौना। रह जाते हैं सारे के सारे तर्क निरर्थक। क्या है कविता में जो मिल जाती है भाषण में तो चमक जाता है नेताओं का वक्तव्य। क्या है कि वह कि बाजार में नहीं बिकती पर मजबूर रहते है उत्पादों के विज्ञापन उसी पर आश्रित। क्या है कविता में कि वह कभी नहीं पडती पुरानी। मैं मानता हूं कि मैंने पहली बार अनजाने में ही अपने पहले प्रेमपत्र में कविताएं लिखी थी। और फिर मांने मुझे उपन्यास लिखते हुए देखा तो डर गई कि यह अब पढाई नहीं कर सकेता तो लेखन पर प्रतिबंध लगा दिया। और अपनी बात को संक्षेप में, कम समय में लिखकर उसे आसानी से छिपा लेने की गरज से कविता लिखनी शुरू की थी। पर अब मां का डर नहीं है फिर भी मैं क्यों लिखता हूं कविताएं मुझे आपने फिर से सोचने पर विवश कर दिया है।
मुझे दूसरी विधाओं में लिखने में कोई दिक्कत नहीं फिर भी कुछ चीजें मुझे लगता है कि केवल कविता में ही संभव है। मैं अपने अनुभव के बारे में तो यही कहना चांगा कि कविता लिखने का अनुभव किसी दूसरी दुनिया के साथ अपने को जोडने का अनुभव है। जैसे कोई और होता है जो हमसे लिखवाता है। जिसे लिखने के वक्त और कई बार लिखे जाने के बाद ही पता चल पाता है कि हमने क्या लिखा है। पहले मैंने प्रयास से कविताएं लिखी थी उनका अनुभव तो गद्य लेखन सा ही है अपनी सुविचारित सोच को शब्द देने की। कहानी मैं तो मैं पहले तय कर लेता ं कि मुझे क्या करना है। भले लिखते वक्त पात्र और परिस्थितियां फिर मेरी लेखनी पर कब्जा कर लेते हैं मगर कविता में पहला संकेत तक मेरा नहीं होता। इसलिए कविता मुझे ज्यादा भरोसे की लगती है। मैं अपनी कविता पर अधिक यकीन करता हूं। कविता में अगर कोई लेखक मक्कारी करता है तो वह पकडी भी जा सकती है। कहानी और लेख लिखने के बाद मुझे लगता है कि एक बोझ था मन पर जो निकला गया। यह विधाएं बोझ कम करने का अनुभव देती हैं। मगर कविता। उसके लिखने के बाद लगता है कि हमें किसी परी ने अपने पंख दिए हों उधार कि जाओ उड लो थोडा तुम भी। कई बार अदृश्य और कई बार बेहद परिचित पर अपनी ही खोई हुई दुनिया, यादों, घटनाओं और भूले बिसरे शब्दों की यात्रा का आनंद देती है कविता रचने के बाद की अनुभूति। कई बार तो पूरी देह रोमांचित और झंकृत हो उठती है। कविता की रचना मेरे लिए जोखिम भरी भी है, क्योंकि मैं कब कवि नहीं रह जाऊंगा नहीं जानता। मैंने कई बार टटोला है कि क्या मेरे अंदर कोई कवि है। तो निराशा हाथ लगती है। पर वह एकबारगी मुझे हैरत में डाल देता है अपनी रचनाओं से। और सच कं तो कई बार वह इतने बदले तेवर में होता है कि लगता है कि यह पहले वाला कवि नहीं है यह तो कोई और है। मैं अपनी कविताओं के बदले हुए तेवर का साक्ष्य भर होता हूं। इसलिए कुछ नहीं कर सकता। लोग कहते हैं कि तुम्हारी कविता का स्वर बदला बदला है तो भी मेरे पास कोई स्पष्टीकरण नहीं होता। कोई तर्क नहीं होता।
॥तीन॥
कविता का सबसे अधिक सरोकार अगर किसी से है तो वह आज़ादी ही है। आज़ादी को सबसे पहली बार शायद कविता ने ही परिभाषित किया होगा क्योंकि स्वप्नों की भाषा या कहें मातृभाषा कविता ही है। स्वप्न हमारी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति न सिर्फ़ सुगमता से कर लेते हैं बल्कि उसके लिए उन्हें किसी तारतम्य की आवश्यकता नहीं होती। स्वप्न अपने साकार होने के मार्ग तलाश नहीं करते बल्कि वे उसकी इच्छा जगाते हैं। कविता चूंकि ऐसी विधा है जिसमें न तो कार्य-कारण के सम्बंध को स्थापित करने की विवशता होती है और ना ही उन युक्तियों को गढ़ने की कि किस प्रकार स्वप्न यथार्थ का रूप ले सकते हैं। आज़ादी का जो भी ख़याल आया होगा उसकी पहली अभिव्यक्ति कविता में ही हुई होगी और इसलिए क्रांतिकारियों की कविताएं हमेशा रिझाती रही है। कई बार तो ऐसा लगता है कि जो ख़्वाब नहीं देखता, जो कविता को नहीं चाहता वह क्रांतिकारी हो ही नहीं सकता।
देश की आज़ादी को कविताओं ने अपने स्वप्नों से सींचा और उस लक्ष्य की प्राप्ति की विकलता को भी बढ़ाया, संघर्ष को भी नयी चमक दी किन्तु कविता ने कभी भी आज़ादी को ही लक्ष्य नहीं बनाया वह देश के लोगों को एक साधन की तरह चाहिए थी, क्योंकि जो आज़ाद नहीं होगा वह मनुष्यता की बेहतरी के लिए कुछ कर ही नहीं सकता। भले ही राजनीति ने आज़ादी का इस्तेमाल अपने लक्ष्य के रूप में किया और सत्ता हस्तांतरण के बाद वह संतुष्ट हो गयी। हालांकि कविता के लिए आज़ादी माध्यम ही थी और रहेगी। उसे आज़ाद मनुष्य इसलिए नहीं चाहिए कि वह दूसरों के शोषण के नये औज़ार बनाये। दूसरों को अपने विकास की सीढ़ी तरह इस्तेमाल करे। कविता के लिए आज़ादी का औचित्य सबके लिए अमन-चैन और शोषणहीन समाज की स्थापना है।
भारत के मौज़ूदा परिप्रेक्ष्य में हम देखें तो पायेंगे कि कविता के साथ विश्वासघात हुआ है। आज़ादी का दोहन हो रहा है। वह कुछ लोगों के लिए असीमित आज़ादी का तोहफ़ा लेकर आयी है। ये आज़ाद लोग कई बार उन लोगों से भी अधिक ख़तरनाक़ हैं जो हमें गुलाम बनाये हुए थे। दूसरों ने हमारा उतना अहित नहीं किया जितना वे कर रहे हैं। आज़ादी के बाद कविता ने मोहभंग झेला। कविता का बड़ा स्वप्न आज़ादी उसे खुशहाली और संतोष देने के बदले सदमे दिये। नयी स्थिति ने उसे किसी हद तक उद्देश्यहीनता क स्थिति में ला खड़ा किया किन्तु जल्द ही उसने अपने औचित्य का एहसास करा दिया। अपने ही कद्दारों की कलई खोलनी शुरू की। अपनी आस्तीनों की हक़ीक़त बयान की किन्तु अब भूमंडलीकरण और उदार बाज़ार व्यवस्था ने शोषण का इतना महीन जाल बुना है कि देश की आम जनता को उसका भान तक नहीं हो पा रहा है। अब इस बाज़ार को सबसे बड़ा ख़तरा कविता से है और कविता को बाज़ार से। बाज़ार ने कविता का स्थान छीनने की कोशिश शुरू कर दी है। सबके सपनों, आशाओं, आकांक्षाओं पर बाज़ार धीमें-धीमें अपना प्रभाव छोड़ रही है। नयी आकांक्षाओं, नयी दुनिया, नये लोगों के जन्म का जो रूपाकार कविता गढ़ती है वह बाज़ार कर रहा है। बाज़ार विभिन्न माध्यमों से ऐसा आदमी, ऐसी रुचियां, ऐसे सपने परोस रहा है जिसका विस्तार बाज़ार के उत्पादों का विस्तार करेगा।
आज़ादी के बाद कविता अपना स्थान खो रही है। कविता के सारे कोमल, चमकदार, संवेदनशील तत्त्व विज्ञापन लील चुके हैं। इससे पहले कि बाज़ार कविता को भी अपने ढंग से संचालित करने की कोशिश करे कविता को अपना संघर्ष तेज़ करना होगा। स्वप्न की अभिव्यक्ति कविता में होना जहां मनुष्यता के लिए शुभ संकेत है वहीं बाज़ार की लक्षित अभिलाषाओं के रूप में हुई तो यह बेहद ख़तरनाक़ मामला है। परोक्ष रूप से वही हो रहा है क्योंकि नयी पीढ़ी के स्वप्नों को दिशा बाज़ार दे रहा है। बाज़ार जो कुछ अभिव्यक्त कर रहा है वही आकांक्षा के रूप में हमारे स्वप्नों और चाहतों में पैठ रहा है। उपभोग की नयी वस्तुओं की प्रमुख कामना आम जनता की प्रमुख कामना हो जाये तो इससे बढ़कर समाज की क्या विडम्बना हो सकती है।

थैंक गाड

बहुत दिनों बाद
मिले मेरे दोस्त ने बताया
कितना है आजकल वह व्यस्त
कितनी है मुसीबतें आजकल
और कितनी से उबकर उसने
नयी मुसीबतों के घर में रका है क़दम

पूरे समय उसे फ़ुरसत ही नहीं मिली
कुछ और पूछने-कहने की
जैसे कि उसने पूरी तैयारी की हो
यह सब बताने की पहले से ही
जबकि यह हमारी आकस्मिक मुलाकात थी
उसे अलबिदा कहने के बाद
मैंने ली राहत की सांस

थैंक गाड
मैं नहीं हूं इतना व्यस्त
कि दूसरे की बात न सुन सकूं
थैंक गाड
मेरे पास नहीं है इतनी परेशानियां
कि उनका हेल-मेल दूसरे से कराऊं।

Thursday, 29 July 2010

वेतन और आदमी

हर महीने की सात तारीख को
अपना वेतन हाथ में लेते हुए
सोचते हैं वेतनभोगी
अब मैं इसे खाऊंगा
पूरे तीस दिन
सिर्फ़ तीस दिन ही नहीं
कोशिश रहेगी बचा रहे
अधिक से अधिक दिनों तक खाने लायक
जुटाने लायक जीने की तमाम सुविधाएं
देने लायक मुसीबत के दिनों में दिलासा
कि है हमारे पास भी कुछ ऐसा
जो कर देगा हमारी मुश्किलें आसान
और कुछ नहीं तो उसके होने से
आ रही है बेखटके नींद

कोशिश रहेगी
उस समय तक बचा रहे
जब तक बची रहें सांसें
बची रहें आल औलादें
यह बात दीगर है
पुरजोर कोशिश के बाद भी
वह घट जाता है तीसरे ही हफ््ते
और वे जानते हैं
अगले महीने भर लगातार
हमें निगलता रहेगा आगामी वेतन
उसकी पूरी कोशिश रहेगी
वह हमें निगल जाये पूरा का पूरा
तनिक भी न बची रहे ऊर्जा
उसकी संभावना तक दूर-दूर

कई बार तो वह
लील जाना चाहता है
हमारी अस्मिता, हमारे सपने
हमारी ना कहने की हिम्मत
हमारी हंसी-खुशी के पल

वेतन चाहता है
हम बचे रहें बस उसके काबिल
रहें बस उसी के लिए
उसी के बारे में सोचते हुए
इस तरह यह सिलसिला
चलता रहता है
बरस दर बरस
चलती रहती है
एक होड़ निगल जाने
और बचा लेने के बीच।

सूर्य की सिंचाई

जब सुबह वे कर रहे होते हैं मार्निंग वाक
देखते हैं
जल रही होती हैं कई लोगों के घर के सामने बत्तियां
जिनका स्वीच बुझा देते हैं बूढ़ों की एक टोली के बुजुर्ग
कोसते हैं उनकी लापरवाही को
कि रात में वे लाइट जलाना नहीं भूलते
लेकिन सुबह बत्ती बुझाना
भूल जाते हैं

उन्हें याद नहीं रहता कि इतना तड़के तो नहीं टूट जाती सबकी नींद

सब तो
नहीं करते इन्तज़ार सुबह का
जैसा वे करते हैं बेताबी से
कि सुबह हो और वे जायें टहलने उन लोगों के साथ
जो उनसे भी ज़्यादा बेकरारी से करते हैं इन्तज़ार सुबह का
क्योंकि उनके पास किसी और चीज़ का इन्तज़ार बचा नहीं होता

और दरअसल वे जिसका करते रहते हैं इन्तज़ार
उसके ख़याल से ही उड़ी रहती हैं उनकी नींद
जिसे वे छिपाते हैं से

हां सबको पता होता है कि वे कहीं जाने के लिए प्रतीक्षारत हैं
और किसी भी क्षण उन्हें जाना पड़ सकता है

उनके जाने की उनसे अधिक उनके क़रीबी लोगों को रहती है प्रतीक्षा

वे काफी अरसे तक अपने घर में ऐसे रहते हैं जैसे रह रहे हों प्रतीक्षालय में

मार्किंग वाक करते समय वे मौसम की चर्चा करना नहीं भूलते
लेकिन दूसरी सारी चर्चाओं से बचते हैं
लौटते समय देखते हैं
कुछ लोगों को लोटे से सूर्य को जल चढ़ाते हुए
और कहते हैं इसीलिए, हां इसीलिए नमी रहती है प्रातः काल की फिज़ा में
रोज कहीं न कहीं, कोई न कोई, कर रहा होता है
सूर्य की सिंचाई।

उदासी

यह क्या है जो ओढ़ रखा है
किसी ने सहसा पूछा
तो मैं सचमुच सोच में पड़ गया
मैंने इस बात पर गौर किया
आईने के सामने ठिठका रहा बड़ी देर तक

बत्ती जलाई
फिर-फिर निहारा
जी नहीं माना तो अरसे से बंद पड़ी खिड़की भी खोल दी और देखा
लेकिन नहीं
कुछ नहीं पता चला कि
मैंने आख़िर क्या ओढ़ रखा है
फिर मैं हैरान हुआ
कि मुझे क्यों हुआ शुबहा
क्या मैं बगैर परखे
विश्वास और दावे के साथ
नहीं कह सकता था
क्या
यही कि यह झूठ है
यह झूठ है
लेकिन क्या झूठ है
क्या पता वह मेरी त्वचा के बारे में ही कह रहा हो
कह रहा हो मेरे पसीने के बारे में
और नहीं तो एक हल्के से
अंधेरे के बारे में तो कहा ही जा सकता है
जो उजाले की कमी में बेशक हो सकता था कुछ गाढ़ा
फिर मैंने छोड़ दिया उस ढंग से सोचना
मैंने सोचा
क्या पता वह पूछ रहा हो कोई
एक शाश्वत सा सवाल
वह पूछ रहा हो किसी कंबल के बारे में
जिसके बारे में कुछ भी कह गये हैं कबीरदास
और मेरे ध्यान कभी गया ही नहीं उस ओर

जस की तस रखने भर की बात ज़रूर सुनी थी
मगर मैं सहेजने के कला से परिचित कभी नहीं रहा
फिर ख़याल आया कि आज के दौर में नहीं हो सकता कोई आध्यात्मिक सा सवाल
हो सकता है उसने थोड़ा परे हट
पूछा हो मेरी उदासी के बारे में
कहीं ऐसा तो नहीं वह मेरी ढाई इंच मुस्कान के ही पीछे पड़ा हो
जो खलती रही है रह-रहकर
मेरे वज़ूद को

इन सबको छोड़कर मैंने उस ओर देखा
जिधर से पूछा गया था सवाल मगर वह एक कागज़ का टुकड़ा था
जिस पर लिखा था
छाते के लिए कोई विज्ञापन
मैं बहुत देर तक
मुस्कुराता रहा
कि बच गया एक जवाब से।

अर्धविराम

क्या किसी विधि विरमित हो सकती हैं मेरी लालसाएं
जिन्हें मैं देना चाहता हूं विराम
मैं देर तक सोना चाहता हूं तमाम हलचलों के बीच
कितना अच्छा लगता है कि तमाम हलचलों के बीच कोई होता है अपने-आपमें तल्लीन और डूबा हुआ
और उसकी तनिक भी नहीं लगता उसे भनक
मैं भी वहीं होना चाहता हूं कुछ पलों के लिए ही सही
क्रियाओं के बीच विरमित

बहुत सारी हलचलों के बीच इस तरह से होना
हलचलों को देता है नया सौन्दर्य
सौन्दर्य का एक नया सा कोण
और कई बार तो विराम बन जाता है हलचलों की दुनिया में एक बड़ी हलचल
क्या मुझे सिखा देगा कोई अर्धविराम
मैं दरअसल खोज रहा हूं ज़रा सी जगह दोनों के बीचोबीच।

दंगे के बाद

इस बिला गये आदमी की
हो रही है शिनाख़्त
शिनाख़्त दंगे के बाद

दंगे के बाद
अपनी पूरी खूराक़ पाता है गिध्द
उससे अधिक वह आंख
जो आदमी को बांट देती है
गिध्द से पहले ही टुकड़ों में
टुकड़े उनके नुकीले संतोष में शामिल हो जाते हैं

दंगे के बाद मोहल्ले
गर्भपात के बाद औरत की उदासी होते हैं
ऐसा नहीं कहूंगा
यह कविता के ख़तरनाक़ कसीदे के
मुलायम आस्वाद का मामला नहीं है

दंगा शब्दों के रद्द हो जाने की
एक प्रक्रिया है
जो शब्दों की ग़लतबयानी का प्रतिफलन है
दंगा एक निशानेबाज़ शिकारी का
मचान से गिर जाने का दुःख है

दंगे के बाद
बचा हुआ आदमी
अपने भीतर मरता है
कसाई देखता है हिकारत से अपने हथियार को
गौर से बकरियों को
सोचता है कितना फ़र्क है
आदमी और बकरी में

दंगे के बाद आदमी ध्यान से पढ़ता है
नाम और सोचता है गंभीरता से नामों के बारे में
डर जाता है सोचकर कि
जानते हैं लोगबाग उसका नाम।

हावड़ा ब्रिज

बंगाल में आये दिन बंद के दौरान
किसी डायनासोर के अस्थिपंजर की तरह
हावड़ा और कोलकाता के बीचोबीच हुगली नदी पर पड़ा रहता है हावड़ा ब्रिज
जैसे सदियों पहले उसके अस्थिपंजर प्रवाहित किये गये हों हुगली में
और वह अटक गया हो दोनों के बीच

लेकिन यह क्या
अचानक पता चला
डायनासोर के पैर गायब थे
जो शायद आये दिन बंद से ऊब चले गये हैं कहीं और किसी शहर में तफरीह करने
या फिर अंतरिक्ष में होंगे कहीं
जैसे बंद के कारण चला जाता है बहुत कुछ
बहुत कुछ दबे पांव

फिलहाल तो डायनासोर का अस्थिपंजर एक उपमा थी
जो मेरे दुख से उपजी थी
जिसका व्याकरण बंद के कारण हावड़ा ब्रिज की कराह की भाषा से बना था
जिसे मैंने सुना
उसी तरह जैसे पूरी आंतरिकता से सुनती हैं हुगली की लहरें

क्या आपने गौर किया है बंद के दिन अधिक बेचैन हो जाती हैं हुगली की लहरें
वे शामिल हो जाती हैं ब्रिज के दुख में

बंद के दौरान हावड़ा ब्रिज से गुज़रना
किसी बियाबान से गुज़रना है महानगर के बीचोबीच

बंद के दौरान तेज़-तेज़ चलने लगती हैं हवाएं
जैसे चल रही हों किसी की सांसें तेज़ तेज़
और उसके बचे रहने को लेकर उपजे मन में रह-रह कर सशंय

बंद के दौरान बढ़ जाती है ब्रिज की लम्बाई
जैसे डूबने से पहले होती जाती हैं छायाएं लम्बी और लम्बी
बंद में कभी गौर से सुनो तो सुनायी देती है एक लम्बी कराह
जो रुकने की व्यवस्था के विरुद्ध उठती है ब्रिज से
और पता नहीं कहां-कहां से, किस-किस सीने से
प्रतिदिन पल-पल हजारों लोगों और वाहनों को
इस पार से उस पार ले जाने वाले ब्रिज के कंधे
नहीं उठा पा रहे थे अपने एकेलेपन का बोझ
देखो, कहीं अकेलेपन के बोझ से टूटकर किसी दिन गिर न जाये हावड़ा ब्रिज

सोचता हूं तो कांप उठता हूं
बिना हावड़ा ब्रिज के कितना सूना-सूना लगेगा बंगाल का परिदृश्य

ब्रिज का चित्र देखकर लोग पहचान लेते हैं
वह रहा-वह रहा कोलकाता
अपनी ही सांस्कृतिक गरिमा में जीता और उसी को चूर-चूर करता
तिल-तिल मरता

सामान्य दिनों में हावड़ा ब्रिज पर चलते हुए
कोई सुन सकता है उसकी धड़कन साफ़-साफ़
एक सिहरन सी दौड़ती रहती है उसकी रगों में
जो हर वाहन ब्रिज से गुज़रने के बाद छोड़ जाता है अपने पीछे
देता हुआ-धन्यवाद, कहता हुआ-टाटा, फिर मिलेंगे
वाहनों की पीछे छूटी गर्म थरथराहट
ब्रिज के रास्ते पहुंच जाती है आदमी के तलवों से होती हुई उसकी धमनियों में
और आदमी एकाएक तब्दील हो जाता है
स्वयं हावड़ा ब्रिज की पीठ में, उसके किसी पुर्जे में
जिस पर से हो रहा है होता है पूरे इतमीनान के साथ आवागमन
और यह मत सोचें कि यह संभव नहीं
पुल दूसरों को पुल बनाने का हुनर जानता है
हर बार एक आदमी एक वाहन एक मवेशी का पुल पार करने
पुल को नये सिरे से बनाता है पुल
हर बार वह दूसरे के पैरों से, चक्कों से करता है अपनी ही यात्रा
पुल दूसरों के पैरों से चलता है अपने को पार करने के लिए
अपने से पार हुए बिना कोई कभी नहीं बन सकता पुल
जो यह राज़ जानते हैं वे सब हैं पुल के सगोतिये

अंग्रेज़ी राज में गांधी जी ने भी बंद को बनाया था पुल
लेकिन अब बंद पुल नहीं है
पुल नहीं रह गया है बंद
सुबह से शाम तक
हर आने जाने वाले से कहता है हावड़ा ब्रिज

यह एक पुल के ख़िलाफ़
आदमी के पक्ष में की गयी कार्रवाई नहीं है
यह पुल के अर्थ को बचाने की पुरज़ोर कोशिश है
और आख़िरकार हर कोशिश
एक पुल ही तो है!

कई बार मुझे लगा है कि बंगाल के ललाट पर रखा हुआ एक विराट मुकुट है-हावड़ा ब्रिज
यदि वह नहीं रहा तो..
तो उसके बाद बनने वाले ब्रिज होंगे उसके स्मारक
लेकिन मुकुट नहीं रहेगा तो फिर नहीं रहेगा।

सप्तक

मेरे जीवन में एक बड़ा विस्फोट था
बेटी का मेरे जीवन में आना
और उससे भी बड़ा
उसके काफी अरसे बाद
मां-बाबूजी की जीवन में वापसी

इस प्रकार खत्म होने लगा
मेरे जीवन और कविताओं का इकहरापन

बेटी व मां-बाप के बीच
बंधी है एक ऐसी महीन डोर
जिससे उड़ रही है मेरे जीवन की पतंग
बह रही हवा एक दिशा से आकर मुझसे होती हुई निकल जाती है दूसरी ओर
मैं एक माध्यम भर हूं
कर रहा हूं एक की आंच का
दूसरे तक हस्तांतरण
एक की भाषा का अनुवाद दूसरी में
जीवन के दो सिरे हैं
इन्हीं दोनों के बीच है
मेरे जीवन का सप्तक
सा से सा के बीच।

मैं ज़रूर रोता

अगर वह कायम रहती अपने कहे पर
और उसके अन्दर-बाहर रह जाता वह मकान
जिसे वह अपना जन्नत कहती है

मैंने देखा, उस मकान के आगे
उग आयी सहसा एक सड़क
जिससे होकर आयेंगे उसके आत्मीय स्वजन
उसकी सखी सहेलियां
उनके बच्चे, डाकिया, अज़नबी
और वह भिखारी भी
जो बुढ़ापे की जर्जर अवस्था में
मुश्किल से चल पाता था

घर के आंगन में उग आये फूल
जिससे महकता है पास पड़ोस तक
घर में ज़गह है मुर्गियों के लिए
गाय के लिए
और मेहमानों के ठहरने के लिए भी
धीरे-धीरे तब्दील हो गया उसका घर
एक पूरे संसार में

मैं ज़रूर रोता
अगर उसका मकान सिर्फ़ उसका घर होता।

जो छूट गया

जो छूट गया है उसका क्या करूं
कहीं छूट गयी हैं
बहुत सारी चीज़ें
बहुत सारी बातें अनकही
बहुत सारे सवालों के ज़वाब
जिसमें था एक बेहद नाज़ुक सा

मैं छोड़ना चाहता हूं अपनी समस्त कामनाएं
एक छोटी सी हां के लिए
उससे पहले मैं चाहता हूं दुनिया की पूरी ताक़त
यदि वह हा न मिले

मैं आगे निकल आया
पता नहीं क्यों?
अभी भी ठीक-ठाक पता नहीं है इस क्यों का

हम आख़िरकार क्यों हैं विवश
पीछे बहुत कुछ छोड़ आने को
जिन्हें हमने अर्जित किया है अपने को खोकर

दरअसल हमें अर्जित करना है खोना
जिसे हमें अपने पाने से बदलना है

छूट गयी है पीछे एक गंध जो शायद याचना से मेल खा सकती थी
सबसे पहले वह बस छूटी अलस्सुबह मेरे गांव के पास के कस्बे से
जिस पर मैं सवार था, फिर छूटने के सिलसिला जुड़ गया

कितना विस्मय है कि होता हूं अक्सरहा अपनी छूटी हुई दुनिया में

क्या मुझे यह दुनिया हासिल करने के लिए जाना होगा एक और दुनिया में
क्यो छोड़े बग़ैर नहीं पाया जा सकता कुछ भी
क्यों है मेरी शिनाख़्त मेरे छोड़े हुए से ही

क्या मेरी उपलब्धियां हैं मेरा हासिल नहीं
मेरा खोना
यह कैसी रवायत है
कि रहना होता है
अपनी खोई हुई दुनिया में।

झूठ की ओट में

सच की रक्षा के लिए तो अब झूठ भी तैयार नहीं
वह जानता है जिसे मारा ही जाना है अन्ततः किसी न किसी मोर्चे पर
क्यों की जाये उसकी रक्षा

कभी न कभी आदतन सच कह बैठेगा कि वह
दुबका हुआ है किसी झूठ की ओट में
और यह सच कहकर वह बढ़ा देगा झूठ की मर्यादा

अब झूठ नहीं चाहता अपने पक्ष में कोई दलील
उसने देखा है ऐसी ही दलीलों के कारण
झूठ नहीं रह सका रक्षणीय
वह डरता है अपने गरिमामंडन से।

इशारा

मैं आ तो गया हूं यहां
पर किसका
किसका इशारा था
इस शहर, इस मोहल्ले, इस किराये के मकान में आने का
क्या राशिफल ने निकाला था कोई निष्कर्ष
कहा था मेरे अवचेतन मन ने मरे सपनों को
हवा ने कहा था-बहो इस ओर
या फिर किसी ने की थी कामना
कि मैं
चला जाऊं
वहां, उस ओर
जहां अपनों को करूं दूर से रह-रह कर याद
मैं उस इशारे को तह से पकड़ना चाहता हूं
जो किसी के आने-जाने को करता नियंत्रित
पर इसके लिए मुझे कहां जाना होगा
यह भी तो असमंजस है
इसे भी तय करेगा
कोई कहां से बैठ चुपचाप।