हर महीने की सात तारीख को
अपना वेतन हाथ में लेते हुए
सोचते हैं वेतनभोगी
अब मैं इसे खाऊंगा
पूरे तीस दिन
सिर्फ़ तीस दिन ही नहीं
कोशिश रहेगी बचा रहे
अधिक से अधिक दिनों तक खाने लायक
जुटाने लायक जीने की तमाम सुविधाएं
देने लायक मुसीबत के दिनों में दिलासा
कि है हमारे पास भी कुछ ऐसा
जो कर देगा हमारी मुश्किलें आसान
और कुछ नहीं तो उसके होने से
आ रही है बेखटके नींद
कोशिश रहेगी
उस समय तक बचा रहे
जब तक बची रहें सांसें
बची रहें आल औलादें
यह बात दीगर है
पुरजोर कोशिश के बाद भी
वह घट जाता है तीसरे ही हफ््ते
और वे जानते हैं
अगले महीने भर लगातार
हमें निगलता रहेगा आगामी वेतन
उसकी पूरी कोशिश रहेगी
वह हमें निगल जाये पूरा का पूरा
तनिक भी न बची रहे ऊर्जा
उसकी संभावना तक दूर-दूर
कई बार तो वह
लील जाना चाहता है
हमारी अस्मिता, हमारे सपने
हमारी ना कहने की हिम्मत
हमारी हंसी-खुशी के पल
वेतन चाहता है
हम बचे रहें बस उसके काबिल
रहें बस उसी के लिए
उसी के बारे में सोचते हुए
इस तरह यह सिलसिला
चलता रहता है
बरस दर बरस
चलती रहती है
एक होड़ निगल जाने
और बचा लेने के बीच।
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Thursday, 29 July 2010
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