रेखांकनःमृदुला सिंह
----------------
तुम जानो, बहुत दिनों से नहीं हू मैं-अर्थ
तुम मानो, बहुत दिनों से नहीं हूं-प्यास
तुम हंसो, बहुत दिनों से हूं मैं-थिर
॥क॥
मैं झुक गया हूं, जहां मैं चल रहा था वहीं।
उसी रास्ते के आगे। मैं रास्ते के आगे प्रार्थनारत हूं।
क्यों;मैं चूका, कहां-यह मत खोजो।
मैं चूक गया था रास्ते से दहलकर।
है भी विकराल।
रास्ते से मुक्त करो छूकर मुझे।
आओ। तुम जानो, बहुत दिनों से नहीं हूं-अर्थ।
मुझमें भरो थोड़ा सा।
बाकी तो भरेगा ही स्वयं, अगर वह सचमुच में हुआ अर्थ।
नहीं भी भर सका, हो ही जायेगा किसी न किसी के लिए रत्ती भर अर्थ।
॥ख॥
मैं गले तक क्यों हूं भरा।
भरा भी हूं या हूं इकहरा।
प्यास ठुनके भौहों पर-अधरों में
आंखों में, हाथों में जगे, मगर लुप्त।
भीतर कुछ क्या हुआ?
प्यास का मर जाना होता नहीम किसी भी भांति।
हुआ है तो कहां जाकर सोई है प्यास की बच्ची।
कान खींचकर लाओ कोई।
दिन चढ़े तक सोना ठीक होता नहीं
प्यास ही सोई रही तो जगेगा क्या?
ओ प्यास, मुझे पी। मुझे लग। प्यास री।
कस के लग। लग मुझे।
॥ग॥
हंसो। सहसा। मुझे पर नहीं-में।
थिर है कहीं कुछ-क्या पता प्राण ही न हो मेरा।
प्राण न भी हो थिर, प्रयत्न तो हुआ ही हुआ है।
उसे झिंझोड़ो। हालांकि हंस के झिंझोड़ना होता नहीं किसी से।
तो फिर हंस के कुछ और करो। क्या चौंकाओगी?
अच्छा चलो बजा दो।
हंस के बजा सकती हो-थिर हवा, थिर नदी, मौन अन्ततः
प्रार्थना हो सकती है पराजित हंसी से
बढ़ सकती है प्रार्थना से हंसी की तासीर।
हंस दो मुझमें।
बहुत दिनों में हो जाऊं-अर्थ। हो जाऊं गति।
जग जाये प्यास।
जानो। मानो। हंसो तो।
