दीघा में समुद्रतट की गीली रेत पर शाम को चलते हुए
अचानक दीख गया एक किशोर
साइकिल पर चलते हुए
जबकि लोग लुत्फ ले रहे थे घुड़सवारी का
मैंने किशोर से कुछ देर के लिए साइकिल ली
किराये पर
और साइकिल पर सवार हो चलने लगा रेत पर
मुझे एकाएक लगा
मैं साइकिल नहीं
रेत पर सवार हूं
यह सवारी मुझे विस्मयकारी लगी
मैं रेत पर सवार था
और दौड़ रहा था
दिगंत के किनारे-किनारे
वह दिगंत
जहां समुद्र का असीम जल
एकाकार हो गया था आकाश से
समुद्र जल में
डूबते सूर्य की परछाही के कारण
यह पता लगाना मुश्किल था कि सूर्य डूब रहा है
या उग रहा है
पता नहीं वह आकाश से समुद्र में डूब रहा है
या समुद्र से आकाश में
उग रहा है
जबकि पर्यटक सूर्य व समुद्र की विस्मयकारी रोशनी का ले रहे थे आनंद
मैं रेत पर सवारी का आनंद लेने में डूबा रहा
और मुझे मिल गयी यात्राओं की
एक नयी कुंजी
बरसों बीते
मैं कभी पतंग पर सवार हो उड़ता हूं हवा में
झूला झूलने लगता हूं
किसी नीम की फुनगी पर बैठ गौरेया के पंख पर
विश्वास कीजिए
मैं चोट से कराह हुआ
जब एक टिकोरे के साथ ऊंची टहनी पर दुबक कर बैठा था कड़ी धूप में
और तेज़ हवा के झोंके से
गिरा ज़मीन पर-धड़ाम
उस दिन चीखा था ‘बचाओ-बचाओ’
जब एक कागज़ की डोंगी में बैठा यात्रा कर रहा था चींटियों के साथ
जो पानी की तेज लहर से अचानक उलट गयी।
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Monday, 5 July 2010
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